जैन धर्म

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जैन धर्म ( सामान्य जानकारी )

जैनधर्म अति प्राचीन है। जैन धर्म के प्रवर्तकों और महात्माओं को तीर्थंकर कहा जाता है।

तीर्थंकर का अर्थ है भौतिक संसार रूपी समुद्र को पार करवाने वाले। दो तीर्थंकरों ऋषभदेव और अष्टनेमि का उल्लेख ऋग्वेद और यजुर्वेद में भी मिलता है। कुछ विद्वानों के अनुसार हड़प्पा की खुदाई में प्राप्त नग्न धड़वाली मूर्ति सम्भवतया किसी तीर्थंकर की है। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। महावीर स्वामी 24वें तीर्थंकर थे। जैन शब्द संस्कृत के "जिन" से बना हैं अर्थात् जीतना, जो इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ले।

जैन धर्म का इतिहास

हावीर स्वामी - महावीर स्वामी का जन्म 599 ई. पूर्व में (कुछ विद्वानों के अनुसार 540 ई.पूर्व) कुण्डग्राम में वज्जि संध के ज्ञातक क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ के यहाँ हुआ था। इनका बचपन का नाम वर्द्धमान था। इनकी माता त्रिशला वैशाली के राजा चेटक की बहन थी। जैन मतानुसार महावीर का विवाह यशोदा से हुआ था। उनके एक पुत्री भी थी। लेकिन माता-पिता की मृत्यु के बाद वर्धमान 30 वर्ष की आयु में अपने भाई नन्दिवर्धन से अनुमति लेकर घर-बार त्याग कर सन्यासी बन गये। अगले 12 वर्षों तक उन्होंने कठोर तपस्या की और 42 वर्ष की आयु में उन्हें परम् ज्ञान (केवल्य) प्राप्त हुआ। इसके बाद वे महावीर, जिन (जितेन्द्रिय) व निर्ग्रन्थ (बन्धनमुक्त) कहलाये और उनके अनुयायी जैन कहलाये। इसके बाद के 30 वर्ष महावीर ने धर्मोपदेश में बिताये। 527 ई. पूर्व में 72 वर्ष की आयु में पावापुरी में उनका निर्वाण (निधन) हो गया। जैन धर्म का उस समय व्यापक प्रसार हुआ।

जैन धर्म की शिक्षायें या सिद्धान्त - जैनधर्म की शिक्षाओं और सिद्धान्तों की जानकारी हमें प्राचीनतम जैन धर्म ग्रन्थ "आगम साहित्य" से मिलती है। इसमें 12 अंग च 12 उपांग का प्रमुख स्थान है।

त्रिरत्न - पूर्व जन्मचित कर्मफल को नष्ट करने और इस जन्म के कर्मफल से बचने के लिए त्रिरत्न का पालन करना आवश्यक बताया है। इन्हीं त्रिरत्नों से निर्वाण सम्भव है। 

ये त्रिरत्न हैं - सम्यक ज्ञान,सम्यक् दर्शन एवं सम्यक् चरित्र। यहाँ सम्यक का अर्थ "सत्" से है।

पंचमहाव्रत - आत्मा को सांसारिक बन्धनों से मुक्त रखने और सत्य की ओर अग्रसर होने के लिए महावीर स्वामी ने जैन भिक्षुक वर्ग के लिए निम्नलिखित पाँच महाव्रतों का कठोरतापूर्वक पालन करना आवश्यक बताया है।

अहिंसा महाव्रत - जानबूझकर या अनजाने में भी किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करना। इसके अनुसार अनुचित भाषण करना एवं बोलना भी हिंसा की श्रेणी में आता है।

सत्य - असत्य वचन का पूरी तरह से त्याग होना चाहिए और भाषण में मधुरता भी हो।

अस्तेय - जब तक अनुमति न हो किसी की वस्तु ग्रहण नहीं करें और न ही ग्रहण करने की इच्छा करें बिना आझा के किसी के घर में प्रवेश न करें, निवास न करें और गृहस्वामी की आज्ञा के बिना किसी की वस्तु को हाथ न लगावें।

अपरिग्रह - किसी भी प्रकार का संग्रह नहीं करना, क्योंकि संग्रह से आसक्ति उत्पन्न होती है। इन्द्रिय विषयों में भी पूर्णतया अनाशक्ति भाव होना चाहिए।

ब्रह्मचर्य - पार्श्वनाथ ने उपर्युक्त चार महाव्रत ही बताये थे। महावीर स्वामी ने ब्रह्मचर्य महाव्रत का पालन और जोड़ दिया। इसके अन्तर्गत किसी नारी से बात न करना। नारी को न देखना, नारी संसर्ग का ध्यान भी न करना, सरल व अल्प भोजन, जहाँ नारी रहती हो वहाँ न रहना, समस्त वासनाओं का त्याग करना आदि बातें सम्मिलित थी।

पंचाणुव्रत गृहस्थ जैन उपासकों के लिए पाँच अणुव्रतों की व्यवस्था की गयी थी। ये भी महाव्रतों की तरह ही थे लेकिन इन गृहस्थव्रतों की कठोरता काफी कम कर दी गयी थी। ये थे - (अ) अंहिसाणुव्रत (ब) सत्याणुव्रत (स) अस्तेयाणुव्रत (द) अपरिग्रहाणुव्रत (य) ब्रह्मचर्याणुव्रत।

सन्यास मार्ग (निवृत्ति मार्ग) स्वामी महावीर के अनुसार गृहस्थ जीवन में मनुष्य की सांसारिक। इच्छाऐं निरन्तर बनी रहती है। अतः उन्होंने इस भौतिकवादी संसार त्याग कर कठोर तपस्या करने एवं ज्ञान प्राप्त करने की शिक्षा दी है।

कर्म और पुर्नजन्म - जैन धर्म ने ईश्वर के स्थान पर मनुष्य स्वयं को अपना भाग्य विधाता माना है। इसके स्थान पर कर्म के सिद्धान्त को महत्वपूर्ण माना है। कर्म से ही संसार का चक्र चलता है। कर्म ही मनुष्य के जन्म मरण का कारण है। इसी के आधार पर मनुष्य का पुर्नजन्म होता है।

अनीश्वर वादी - जैन धर्म ने ईश्वर को सृष्टि का कर्ता नहीं माना है। सृष्टि तो अनादि और नित्य है कर्मबंधन में बंधा जीव तीर्थकर द्वारा बताये गये मार्ग के अनुसरण से ही संसार के भौतिक बंधनों से मुक्ति पा सकता है।

अनेकान्तवाद - महावीर स्वामी के अनुसार किसी भी वस्तु का एक गुण या धर्म नहीं होता अर्थात् कोई भी वस्तु एकान्तवादी नहीं हो सकती। इसी दर्शन पर जैन धर्म का स्यादवाद का सिद्धान्त आधारित है।

अनेकात्मवाद - जैन धर्म आत्मा के अस्तिव को मानता है। जिस प्रकार जीव अलग अलग होते हैं। उसी प्रकार आत्माऐं भी अलग अलग होती हैं। इसीलिए जैन धर्म को अनेकात्मवादी कहा है। यदि सभी जीवों में एक ही आत्मा होती तो सभी पदार्थ एक समान होते।

अठारह पाप - स्वामी महावीर ने अठारह बुरे कार्य या पाप बताये हैं जिससे बचना चाहिए। ये हैं- हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन, अपरिग्रह, क्रोध, राग, लोभ, माया, कलह, चुगली, असंयम, द्वैष, मान,छल, कपट, निन्दा, मिथ्यादर्शन, आदि।

मोक्ष या निर्वाण - जैन मतानुसार जीवन का चरम लक्ष्य मोक्ष या निर्वाण प्राप्त करना है। इसकी प्राप्ति कैवल्य ज्ञान से ही सम्भव है। पूर्व में संचित कर्मफलों को समाप्त करना और इस जन्म के कर्मफलों से अलग रहना ही निर्वाण है। निर्जरा (आत्मा में प्रविष्ट भौतिक विषयों को नष्ट करना) के माध्यम से जीव अपने कर्म बंधनों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है। यही मोक्ष की अवस्था है।

• जैन दर्शन के इस सिद्धान्त को सप्तभंगीनय के स्यादवाद की मान्यता है कि सत्य के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का अलग अलग दृष्टिकोण होता है। सत्य के बारे में सात नाम से भी जाना जाता है। जैन विचारकों प्रकार के कथन कहे जा सकते हैं

1. स्यात्अस्ति - शायद वस्तु है

2. स्यात नास्ति - शायद वस्तु नहीं है

3. स्यात् अस्ति च नास्ति - शायद वस्तु है और नहीं है

4. स्यात् अव्यक्तम् - शायद उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता

5. स्यात् अस्ति च अव्यक्तम् - शायद वस्तु है उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता।

6. स्यात् नास्ति च अव्यक्तम् - शायद वस्तु नहीं है और उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता।

7. स्यात् अस्ति च नास्ति च अयव्यक्ततम् - शायद वस्तु है, नहीं है और उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता

उपवास एवं तप का महत्व -  जैन चिन्तकों ने व्रतों, उपवास और तपस्या को विशेष महत्व दिया है। साधना के लिए शरीर की बाह्य तपस्या और आन्तरिक तपस्या दो मार्ग बताये हैं। जैन धर्म के अनुसरण को कठिन माना है लेकिन यह कठोरता जैन श्रमणों के लिए है ।

आडम्बरों एवं कर्मकाण्डों का विरोध -  जैन धर्म के अन्तर्गत बाह्य आडम्बरों और वैदिक कर्मकाण्डों को उचित नहीं बताया गया। इसी प्रकार जैन धर्म ने वर्ण एवं जाति भेद को भी नहीं माना है।

जैन धर्म का प्रसार - 30 वर्ष तक स्वामी महावीर ने अनेक स्थानों पर भ्रमण करके अपने उपदेशों का प्रचार किया। जैन धर्म को राजाओं का आश्रय भी मिला। राजा चेटक, चण्डप्रद्यौत, बिम्बिसार और अजातशत्रु महावीर स्वामी के अनुयायी बने। तीसरी शताब्दी ईसवी पूर्व तक जैन धर्म मथुरा, मालवा, गुजरात, मगध, आन्ध्र, कर्नाटक व तमिलनाडु में प्रसारित हो चुका था। जैन धर्म भारत में आज भी जीवित है।

भारतीय समाज और संस्कृति को जैन धर्म की देन : स्वामी महावीर की शिक्षाओं और सिद्धान्तों ने हमारे देश को व्यापक रूप से प्रभावित किया। यद्यपि बौद्ध धर्म की तरह जैन धर्म का भारत से बाहर प्रसार हुआ तथापि कला साहित्य, धर्म, दर्शन और चिन्तन के क्षेत्र में जैन मत का उल्लेखनीय योगदान है।

एक प्रभावशाली धर्म के रूप में जैन धर्म आज भी जीवित है। अहिंसा का विचार जैन धर्म की ही देन है। पाँच व्रत भारतीय संस्कृति के प्रमुख तत्व हैं। अहिंसा हमारी संस्कृति का मूल मंत्र है। स्याद्वाद धार्मिक सहिष्णुता का नमूना है। वर्ण व्यवस्था एवं जाति व्यवस्था को अस्वीकार कर महावीर स्वामी ने सामाजिक एकता को प्रोत्साहित किया तथा भ्रातृभाव का व्यापक विकास किया। भाषा और साहित्य के विकास में भी जैन धर्म के द्वारा प्राकृत, संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में साहित्य सृजन करके महत्वपूर्ण योगदान दिया। जैन मन्दिर, मूर्तियाँ, गुफाएँ, आदि का निर्माण करके कला के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। देलवाड़ा एवं रणकपुर के जैन मन्दिर वास्तुकला के विस्मयकारी नमूने हैं।

" जय जिनेन्द्र "

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" जय हिन्द "

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